Monday, December 20, 2010

दुनिया पर एक नजर झटके में !! क्योंकि हर झटका कुछ कहता है....!!

बड़ी ही मजेदार बात है भाई , हमारी फिल्मों के गाने भी अकस्मात् ही हमारे समाज और देश की कथा और व्यथा को  बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के या  मकसद के व्यक्त कर देते हैं जैसे आज के एक हिट गाने को लीजिये  , गाने के बोल है की  " जोर का झटका हाय  जोरों से जगा ..हाँ लगा "  लेकिन ये जोर का झटका कुछ ज्यादा ही जोर से  झटके  दे रहा  है , जैसे की आजकल हमारे देश के नेताओं को , मंत्रिओं  , मुख्या मंत्रिओं को  अबिनेताओं को , निर्देशकों को और कई सारे सफल , संपन्न और पहुँच वाले लोगों को ४४० वाट से भी बड़े बड़े झटके लग रहे हैं !
ऐसे में इस गाने की प्रासंगिकता कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती  है  यह बात और है की  जिस फिल्म का यह गाना है उसके निर्माता को , कलाकारों को कुछ क्यादा ही जोर का  झटका लग गया तभी तो इस गाने को छोड़  पूरी फिल्म को झटका लग गया !  खैर यह तो पिक्चर की बात है , हकीकत मैं तो कुछ ज्यादा ही झटकेदार पिक्चर चल रही है , कांग्रेस के बेनर तले बन रही नई नई  कहानिओ के पात्र और घटनाएँ  जैसे जैसे बहार आ रहे हैं एक नया झटका देते जा रहे हैं ,  एक आदर्श झटका अशोक चव्हाण देने वाले थे तो उनको ही झटका लग गया , यही हाल 2g  किंग का हुआ झटके से अरब पति बनने चले थे झटका खा के रह गए .
वहीँ कुछ झटका टाटा को  भी  लगा  इस झटके ने कई सरे बड़े बड़े  उद्योग पतिओं को भी झटके से संभलने  का  एक मौका दिया तभी तो  सब उद्योगपति अपनी अपनी फ़ोन लाइन की निगरानी में झटके से लग गए की कहीं उनको धोके से भी  झटका ना लग जाये. वहीँ wikilieaks कांड ने पूरी दुनिया को झटका दे दिया , तो भारत की क्रिकेट टीम को दक्षिण अफ्रीका जाते ही झटका लग गया , जहीर की चोट का नहीं  , बल्कि १३६  रन पर आउट होने का झटका ...लेकिन इन झटकों के बीच में सचिन ने एक झटके से अपना ५०वा शतक पूरा कर दक्षिण अफ्रीका के गेंदबाजों को झटका दे दिया वहीँ इंग्लैंड जो एक झटके से ashesh  को जीतने के सपने देख रहा था उसे ऑस्ट्रेलिया ने झटका दे दिया ...   भाई यह तो दुनिया दारी बातें रह गयी इन बातों से अपने आम आदमी को क्या  लेकिन जब आस पास इतने झटके हो तो   इन सारे झटकों के बीच आम आदमी कैसे ठीक रह सकता है...  हालांकि आम आदमी तो झटक खाने की आदत माँ के पेट से ही सीख के आता  है , मगर  सरकार अपने आम  आदमी की सेहत का पूरा ध्यान रखती है  तभी तो  महंगाई के ज़माने में इस आम आदमी को पयाग खिलने के बहाने नया झटका दे दिया ६० रुपये किलो का झटका...
 तो इस झटके लीला के क्या कहने इन झटकों ने तो पूरा एक पेज भर दिया , कहने को तो काफी है पर करे क्या साइबर में बैठ के और लिखूंगा तो साइबर वाला मुझे भी एक झटका दे डालेगा...
बस क्या  अगली  मुलाकात तक ..   .  संभल के रहिये ..  खुश रहिये और हाँ जिन्दगी के झटकों का आनंद लेते रहिये.          

Deepak singh 
09022960206

Monday, September 6, 2010

बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ....

पाकिस्तान  के ४ खिलाडी फिक्सिंग की फांस मैं फंस गए हैं... तो वहीँ भारत के कलमाड़ी साहब भी कुछ इसी तरह के आरोपों में घिरे हैं..  लेकिन इस सब से उन खिलाडिओं को या अपने कलमाड़ी जी कोई टेंशन नहीं है.. भाई पब्लिसिटी  तो हो हे रही है न..  बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ...  
वैसे भी कितने लोग ऐसे हैं जो लोग किसी अख़बार या किसी न्यूज़ चैनेल मैं  अपनी एक फिक्स जगह बना पाए हैं... आज हर कोई आमेर , आसिफ या बट को जनता है वहीँ अपने कलमाड़ी जी को भी बच्चा  - बच्चा जानने लगा है..यह शोहरत और यह कीर्तिमान कोई अच्छा या बड़ा कम करने से तो मिलेगा नहीं और हाँ ..  इस तह के काम करने के बाद इन जैसे लोगों  लिए रोजगार के भी नए अवसर खुल सकते हैं..   जैसे की कोई टीवी चैनेल  इन्हें  अपने शो मैं बुलाएगा... कुछ नहीं तो बिग बॉस जैसे शो मैं तो इनका  आना १००% पक्का हो जायेगा...   जहाँ यह लोग टीवी पर आकर हर किसी को बता सकेंगे की कैसे कोई मैच या कोई आयोजन फिक्स किया जाता है.. कैसे पैसा बनाया जाता है और कैसे कोई छोटा से छोटा काम भी कई सालों मैं लाखों - करोड़ों रुपये खर्च कर के किया जा सकता है..  भाई ऐसा ज्ञान देने वालों को तो वाकई मैं नेशनल टीवी पर आन चैयेह और अपना ज्ञान बांटना चाहिए .
सलमान बूट हो या आसिफ या आमेर जिस तरह से आजकल टीवी पर इनके हँसते हुए चेहरे और अपने कलमाडी जी का विश्वास से भरा हुआ चेहरा दिखाया जा रहा है उससे तो यही साबित हटा है की इनको अपने किए गए ऐतिहासिक कार्यों  पर गर्व है...  लेकिन उन सब लोगों का क्या जो इन जैसे लोगों के किए गए कार्यों मैओं कमी निकल रहे हैं या इनको सजा देने की मांग कर रहे हैं..." मेरे ख्याल से यह लोग इस बात से ज्यादा चिढ़े हुए हैं की भला इनको इतना मान सामान मिल रहा है और हमसे सिर्फ राय माँगी जा रही है .  बताइए भला उनको सब दे दो और हमको कुछ देना तो दूर राय भी मांग लेते हो...बड़ी ना इंसाफी   है ...
खैर जो भी हो चाहे इन जैसे लोगों का कुछ हो या ना हो...   यह लोग आज एक बहुत बड़ी हस्ती बन चुके है..पूरा संसार आँखें  फाड़ के इनकी  तरफ देख रहा है...की कैसे इनके ऊपर दौलत और शौहरत की बारिश हो रही है और कैसे हम जैसे मेहनती , शरीफ और  भलाई करने वालों को कोई नहीं पूछ रहा है...  मीडिया और तमाम माध्यम इन जैसे लोगों को हाथों हाथ ले रहे है,,,   इससे क्या साबित हो रहा है...  इसे तो साबित यही हो रहा है की..प्रस्सधि पाना है. नाम कमाना है तो कोई लफड़ा कर दो... नाम मिलेगा , दाम मिलेगा और खूब काम भी मिलेगा...  मेरी बातों पर भरोसा नहीं तो खुद ही देखो ना.. संजय दत्त, फरदीन खान , सलमान खान , राहुल महाजन, मोनिका बेदी या शाइनी आहूजा   ....जैसे लोगों को जिन पर कई केस चले और चल भी रहे हैं ...  आज यह लोग शोहरत के आसमान पर बैठे हैं...और तो और कई सारे टीवी चैनेल इन लोगों को दुनिया भर मैं  प्रसिद्द बनाने  मैं लगे है...
  तो कुल मिला के सब बातों का सार तो यही  है भैया की वो दिन गए जब आपको इमानदारी और मेहनत के काम का इनाम मिलता था, आज तो इस तरह के लोगों को  आउट डेटेड कहा जाता है..  चलो अच्छा ही है..  कुछ नया तो सीखने को मिला ... की नाम मत बनाओ ..  बदनाम हो जाओ ताकि नाम खुद ही बन जाये.. पर मैं ऐसा क्या करूँ .. कुछ सलाह दो ना...

Thursday, August 19, 2010

जागरण के लेख के सन्दर्भ मैं मेरे विचार..

कांग्रेस की अनैतिकता..
वाकई कुलदीप जी ने जो तथ्य और जो मुद्दा उठाया है , और जो सवाल उठाये हैं उनका जवाब मिलना शायद मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा..   क्योंकि सिर्फ दस्तावेजों की नहीं रह गई है चाहे आजादी से सम्बंधित दस्तावेज हों या आपातकाल से सम्बंधित दस्तावेज , चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष... हर कोई मौन है और शायद मौन रहेगा.. क्योंकि इन दस्तावेजों से किस को क्या फायदा होने वाला है ...  क्योंकि इस राजनितिक हमाम  मैं सब एक जैसे हैं....  ऐसे मैं उन दस्तावेजों के लापता होने की वजह नहीं बल्कि उसका ठीकरा किसके सर फोड़ा जाये और कांग्रेस खुद अपना दमन कैसे बचाए , सरकर का पूरा ध्यान तो सिर्फ इसी बात पर रहेगा ... वैसे भी कांग्रेस पार्टी हमेशा से ही अपनी गलतियों के बचाव के लिए अन्य गड़े हुए मुद्दों को उभरती आई है और सच्चाई से मुह छुपाती आई है.. ऐसे मैं कांग्रेस के अनैतिक आचरण को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता चाहे भोपाल कांड हो या बोफ़ोर्स कांड हो या इन दोनों घोटालों में बरती गई कांग्रेसी ढिलाई हर किसी को पता है...

उद्देश्य से भटका आयोजन..
इसी विषय पर मेरा एक पूर्व लिखित ब्लॉग पढ़ें.. बात सिर्फ कॉमन वेल्थ गमेस की नहीं है.. बातउस मुद्दे की है की क्या हमारे देश की नाक और इज्जत इन खेलों की वजह से दांव पर लग चुकी है वो भी ढीली ढाली और सुस्त " हिन्दुस्तानी "  कार्यशेली के कारन . यहाँ हुन्दुस्तानी से मेरा आशय हमारे देश की उस कार्य प्रणाली से है जहाँ हर किसी कार्य की तय समय सीमा हर तय समय पर एक और तय समय के लिए बढ़ा दी जाते है..  ऐसे मैं इन खेलों की वजह से हमारे देश की किरकिरी तो होना स्वाभाविक सी baat है..  और रही बात दिल्ली की बेहाल सूरत की तो दिल्ली का तो अब भगवान् ही मालिक है , वैसे शीला जी पूरी तरह से विश्वस्त हैं की तय समय सीमा के भीतर न सिर्फ दिल्ली में हो रहे विकास कार्य पूरे हो सकेंगे बल्कि दिल्ली कॉमन वेल्थ खेलों का आयोजन विश्वस्तर से भी बढ़ कर करेगी.  हाँ भाई हमे भी यही उम्मीद है वैसे भी अब तो खुद प्रधान मंत्री जी ने इन खेलों की कमान संभाल ली है ..   काश यह कदम उन्होंने पहले उथया होता .. तो कम से कम कलमाड़ी जी और उनकी मण्डली की वजह से देश की आम जनता की आँखों मैं यह खेल करक तो न रहे होते..   क्योंकि यह खेल चाहे  देश की साख को बचा जाएँ पर उस बहरे दिल्ली वाले आम इंसान का क्या जो इन खेलों के कारन पिछले न जाने कितने दिनों से परेशां हुआ जा रहा है...

जागरण के लेख के सन्दर्भ मैं मेरे विचार..

Tuesday, August 17, 2010

टेंशन लेने का नहीं क्या...!!!

आज के इस भाग दौड़ और तनाव भरे जीवन मैं हमे हर पल किसी न किसी बात की चिंता बनी ही रहती है..हम चाहे कितना भी चाहें यह तनाव और यह चिंता हमे कहीं न कहीं  घेर ही लेती है जैसे की ,   जब हम घर से निकलते हैं तो ऑफिस जल्दी पहुँचने की चिंता , ऑफिस मैं बॉस के गुस्से से बचने की चिंता , ऑफिस में तरक्की पाने की चिंता , महीने के अंत मैं तनख्वा मिलेगी या नहीं इसकी चिंता  इत्यादि .  तो घर मैं तो चिंताओं का भण्डार ही लगा रहता है कभी बच्चों की पढाई लिखाई की चिंता तो कभी जरूरी चीजों की पूर्ती के लिए प्रबंध करने की चिंता , कभी इसकी तो कभी उसकी किसी न किसी बात की चिंता तो हर किसी को लगी ही रहती है ..
कहने को तो हमसे हर कोई कहता है की चिंता चिता के सामान होती है ,,  मगर इससे क्या कोई चिंता करना छोड़ देता है..  चिंता या टेंशन या तनाव कोई भी व्यक्ति जान भूझकर तो नहीं करता और कोई करना भी नहीं चाहता, लेकिन इस तनाव और चिंता ने अपना दायरा इस कदर बाधा लिया है की आज कल के बच्चे भी इसकी चपेट मैं आने लगे हैं, इसी का तो कारन   है की छोटी सी उम्र मैं बच्चे आत्महत्या जैसा कदम उठाने लगे हैं, यदि कोई बच्चा परीक्षा मैं फ़ैल  हो गया, या उसके नम्बर कम आये तो उसे चिंता और तनाव होने लगता है की अब क्या होगा , घर पर डांट पड़ेगी, पापा और मम्मी मारेगी  ..और भी तमाम तरह के विचार आने लगते हैं  बस हो गया उस बेचारे मासूम से बच्चे को तनाव या जिसे हम कहते हैं " स्ट्रेस" 
क्या इस चिंता या इस तनाव का कोई इलाज है ..  ???? हम में से हर कोई सोचेगा की इसका क्या इलाज होगा ???   मैं कहता हूँ की इसका इलाज है, और इलाज भी कोई बहुत पेचीदा नहीं है ,, इस इलाज को हर कोई अफ्फोर्ड कर सकता है , इलाज है की जितना भी हो सके खुशमिजाज रहिये , हर किसी मुसीबत का एक हल होता है इसलिए चिंता करने के बजाय मुसीबत या समस्या का हल ढूँढने की कोशिश करें, कभी भी तनाव आप पर हावी न हो इसलिए  सदा आशावादी रवैया लेकर चलें. कभी भी यह न सोचें की "" हाय राम अब क्या होगा"" जीवन हमारी सबसे बड़ी पाठशाला है इसलिए हर किसी बात से एक सबक लेकर चलें,  यदि आपके साथ कुछ गलत हो गया , कुछ नहीं मिला या आप किसी इम्तिहान मैं फ़ैल हो गए तो क्या हुआ ??? जिन्दगी वहीँ पर ठहर तो नहीं जाती न.. जरा सोचिये आज जो लोग कामयाब हैं. क्या उन लोगों ने तनाव का सामना नहीं किया ?  किया है और उस तनाव पर उन्होंने विजय पाई इसलिए आज यह लोग कामयाब हैं..अब्राहम लिंकन को आज दुनिया याद करती है लेकिन अपने समय में वे एक "  लूसर या एक असफल इंसान कहलाते थे"  तो क्या वे जीवन भर असफल रहे??  नहीं वे एक सफल राष्ट्राध्यक्ष बने और आज पूरा विश्व उनके बताये रास्ते पर चल रहा है..  इन बातों का ध्येय यही है की खुश रहिये और चिंता को अपने पर हावी मत होने दीजिये. चिंता मग्न होकर आप कोई काम करेंगे भी तो वो काम आपको नुक्सान ही पहुंचाएगा इसलिए खुशमिजाज रहें और आपके आसपास भी हंसी ख़ुशी का माहोल रखें , और हाँ कभी भी किसी पर अपनी राय  या अपना नजरिया थोपने से बचे क्योंकि इन्ही आदतों से तनाव और चिंता बढती है ...  याद रखें खुश रहेंगे तो आपको देख कर लोग भी खुश रहेंगे , लेकिन आपको रोता हुआ या तनाव ग्रस्त देख कर लोग भी आपसे कतराने लगेंगे ...और सोचेंगे की यार यह तो हमेशा ही टेंशन मैं रहता है ,  इसके पास आकर अपने को भी टेंशन लग जायेगी ..  चलो निकल लो इसके पास से..
ऐसा मत होने दीजिये और यदि कुछ गलत हो भी गया तो यह मत सोचिये की अब क्या होगा???   जीवन बहुत बड़ा है और आपके लिए भी उस इश्वर ने कुछ सोच रखा होगा इसलिए क्षणिक असफलताओं को भुलाकर जीवन का अनद लेते हुए अपने लक्ष्य को पाने मैं लग जाइये और देखिये की आप कहाँ पहुँचते हैं...

Friday, August 13, 2010

कितने आजाद हैं हम ????

"" अरे यार तुझे पता है क्या इस बार १५ अगस्त सन्डे को है... क्या ????  धत तेरे की  यार... एक छुट्टी मारी  गई...!!!    यह मेरे मन की बात नहीं बल्कि आज कल के हर इंसान के मन की आवाज है...  हो भी क्यों न आज १५ अगस्त हो या २६ जनवरी आम आदमी के लिए इन दोनों दिनों का मतलब  सिर्फ छुट्टी मानाने और घूमने के लिए मिली छुट्टी से है वैसे भी इन दोनों दिन होता क्या  है  वही घिसे-पिटे रटे रटाये राजनितिक भाषण , गली गली मैं मनोज कुमार की फिल्मों के  देश भक्ति के गाने और टीवी पर देशभक्ति की फ़िल्में और अखबार मैं भी वही सब पुरानी देशभक्ति की कहानियां जो पता नहीं कितनी बार पढ़ चुके हैं , ऐसे मैं क्यों न घूम ले या पिकनिक मन ली जाये क्योंकि अगले दिन से हर किसी को  अपनी अपनी व्यस्तताओं मैं भी तो लगना है.

वाकई आज की पीढ़ी के लिए इन ऐतिहासिक दिनों का शायद ही कोई महत्व रह गया है? और इस सब के पीछे कोई और नहीं बल्कि हमारे देश के नेता और हमारा तथाकथित सिस्टम है , आजादी के बाद से हमारे देश ने बहुत ज्यादा प्रगति की है बुनियादी जरूरत , विज्ञानं , तकनिकी , रक्षा , कला आदि क्षेत्रों  में आज हम आसमान की ऊंचाई को छु रहे है , लेकिन क्या वाकई में हम इतनी तरक्की कर रहे है या यह तरक्की और हमारी आजादी उस हाथी के दांत की तरह है जिसके खाने और दिखने के दांत अलग होते हैं ??   
शायद हाँ क्योंकि हम जितना विकास कर रहे हैं उतना ही पिछड़  भी तो रहे हैं..आज हम भेदभाव और प्रांतीयता के नाम पर लड़ने मैं भी तरक्की कर चुके हैं..  पहले सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर लड़ते थे , आज हिंदी  , मराठी और तमिल के नाम पर  लड़ रहे हैं..  आजादी के बाद से गरीबों को सपने दिखाए गए की उनकी गरीबी ख़तम हो जायेगी,,  पर आज गरीब की गरीबी और आमिर की अमीरी भी तरक्की पर है..कहने को हमारा देश तरक्की पर है पर बेरोजगारी भी तो तरक्की पर है हो भी क्यों न.. बेचारा बेरोजगार योग्य होते हुए भी सड़क पर भटक रहा है और अयोग्य लोग न सिर्फ राज कर रहे हैं बल्कि हर खली पद पे अपने -अपने लोगों को बिठा रहे हैं . बेरोजगारी बढ़ी तो महंगाई क्यों पीछे रहे मेह्नागाई इतनी बढ़ी है की  रोटी, दाल , चावल और सब्जी से भरी थाली की जगह सिर्फ रोटी और चटनी ही नजर आ रही है. 
देश ने रक्षा के क्षेत्र मैं भरी प्रगति की है पर उन जवानों को या उन शहीदों के परिवारों को क्या मिल रहा है वही ३००० या ५००० रूपए की पेंशन , बेचारा सिपाही जब अपने देश के लिए जान लुटा देता है तो उसकी जान की कीमत लगे जाती है ५००००० रूपए लेकिन जो लोग देश के मासूम लोगों की जान ले रहे है देश उन हत्यारों की सुरक्षा मैं कई करोड़ रूपए लुटा रहा है..  वाकई आज हम प्रगति पर हैं.. इतनी प्रगति हमे आजादी के बाद ही तो हासिल हुई है..
  ऐसी आजादी  जहाँ ताज होटल मैं चप्पल पहन कर आई एक वृद्धा को  बहार निकल दिया जाता है. अंगरेजी न बोल पाने के कारन लोगों को नोकरी नहीं दी जारही है , लोगों को प्यार करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पद रही हो, नौकरी के लिए अन्य प्रान्त में गए लोगों को मार -मार  कर भगाया जा रहा हो... ऐसी आजादी का कोई गुणगान भी नहीं करना चाहेगा.
..रही बात आजाद होने पर गर्व करने की तो आजादी एक अनुभूति होती है जिसे सिर्फ महसूस किया जाना चाहिए और इसे महसूस करते हुए हमे यह भी सोचना चाहिए की क्या वाकई मैं हम आजाद हैं , सिर्फ अंग्रेजों के भारत छोड़ जाने से ही हम आजाद हो गए या अंग्रेजों के जाने के बाद हम अपने बनाये सिस्टम के गुलाम हो कर रह गए हैं..


Wednesday, August 11, 2010

सफलता और सरलता.. का आपसी जुडाव... राजू हीरानी...

हमारे देश में फ़िल्में तो कई सालों से बन रही हैं, लेकिन कितनी ऐसी फ़िल्में बनी है जिन्होंने न सिर्फ आम आदमी के मन को समझा, उसे छुआ  बल्कि कामयाबी की एक नयी इबारत भी लिख डाली. शायद  फिल्मों के अस्तित्व में आने के बाद से कुछ चुनिन्दा फ़िल्में ही ऐसी होंगी ...४० के दशक से लेकर अब तक हमारा सिनेमा काफी बड़ा और वैश्विक हो गया है...अब तो फिल्मे भी आम भारतीय आदमी के लिए नहीं बल्कि अप्रवासी भारतीय नागरिक के लिए बनायीं जाती है.  तकरीबन हर फिल्म की शूटिंग विदेश मैं होती है...  हर कोई फिल्मकार ज्यादा से ज्यादा विदेशी दर्शकों को लुभाना चाहता है.. असी दौर मैं यदि एक निर्देशक सिर्फ और सिर्फ अपने देश के हर उस आम आदमी को ध्यान में रख कर फिल्म बना रहा है और कामयाबी के नए इतिहास भी रच रहा है..  और वो इंसान है राजू हिरानी..  ऐसा नहीं की राजू जी ने कोई अजूबा कहानी लिखी हो जो की कभी सुनी या देखि न गई हो..  बल्कि उन्होंने तो सीधी  सादी लेकिन मन को छु लेने वाली  कहानी को बड़े ही सरल और सामान्य तरह से पेश किया जिसमे न तो कोई बड़े बड़े ताम झाम थे न ही किसी विदेशी  लोकेशन पर शूटिंग और न ही गैर जरूरी सेट थे और  न ही  कोई  जबर्दास्त्त डाला गया आइटम सोंग ,  जो की हर फिल्मकार की पहली जरूरत होते है इन सब के बगेर भी  कामयाबी की एक ऐसी मंजिल को छुआ जिसे कई कई तथा कथित नामी और बड़े  निर्देशक शायद ही छु सकें...
राजू ने मुन्ना भाई में जो थेमे पकड़ी थी उसी थीम को आमिर खान के साथ लेकर  विस्तृत रूप दिया..आमिर और राजू का संयोग एक तरह से होना ही था.   जब आमिर ने तारे जमीन पर बनायी  और जिस तरह के सिनेमा राजू रचना जानते है..  ऐसे मैं इन दोनों महाराथिओं का मिलन तो होना ही था...एक तरफ आमिर का सजीव अभिनय और राजू का सरल अंदाज ..    मेरे ख्याल से आज के उन तमाम निर्देशकों को राजू से कुछ सीखना चाहिए ...कीकहानी को जितना सरल और मनोरंजक रखा जायेगा आम आदमी को फिल्म देखने में उतना ही आनंद आएगा...   क्योंकि राजू की फिल्मों में तकरीबन वही सब दिखाया गया है जो हर आदमी सोचता है, या करना चाहता है.. पर अपनी जिम्मेदारिओं के बोझ तले कर नहीं पता..  ऐसा नहीं की राजू ने अपने सिनेमा में जो दिखाया वो कुछ अजीब है,,   या ऐसा हो नहीं सकता,,   बल्कि राजू और आमिर ने अपने अपने अंदाज में वोही दिखाया है जो की हमारे समाज में होता आ रहा है..  मेरा तो यही कहना है की चाहे फिल्म हो या कोई कहानी या कोई विज्ञापन..  यदि आपका इरादा उस कहानी या विज्ञापन को सफल बनाने का है तो उसे जितना हो सके सरल और वास्तविक रखें ताकि हर कोई इंसान उस से खुद को कहीं न कहीं जुडा हुआ महसूस कर सके..  इसी जुड़ाव से तो सफलता जुडती है...  क्या ख्याल है आपका...

Tuesday, August 10, 2010

किवी ने दिखाया टीम इंडिया को २०० का दम...


सिर्फ ३ दिन पहले तक जिस टीम इंडिया की शान मैं कसीदे कहे जा रहे थे , वो टीम इंडिया कल के मैच में न्यू जीलेंड की अपेक्षाकृत कम अनुभवी टीम के आगे ढेर हो गई...जिस टीम में कई सारे नए खिलाडी थे लेकिन हर खिलाडी में एक मैच विन्नेर था , जिनके आगे हमारी टीम इंडिया के तथा कथित " शेर " हो गए ढेर.....  जिस टीम ने श्री लंका की जमीन पर पिछला पूरा १ महिना बिता दिया आज वो टीम उस टीम के आगे फिस्सडी साबित हो गई जो जुम्मा जुम्मा ४ दिन पहले ही श्री लंका पहुंची है...  क्या हमारा अति आत्मा विश्वास ही हमे ले डूबा...बात सोचने वाली है..  ३ बल्लेबाजों के अलावा किसी भी अन्य खिलाडी ने २ अंको मैं भी सकारे नहीं किया जिसमे हार्ड हिटर  युवराज , रैना और खुद कप्तान धोनी शामिल थे.. क्या करना छह रहे थे हमारे खिलाडी क्या द्रेस्सिंग रूम में कुछ खास हो रहा था जिसे देखने की जल्दी मैं हर कोई जल्द से जल्द आउट होने की ओपचारिकता पूरी करके वापस द्रेस्सिंग रूम जाने की जल्दी में था...
आज कल के क्रिकेट में यदि आपने किसी टीम को ५० ओवर के भीतर यदि ३०० से कम स्कोर पर रोक लिया तो समझिये की आपने आधा मैच जीत लिया.. शायद यही गलती हमारी टीम इंडिया से हो गई ,,,  कप्तान ने सोचा होगा की वीरू शुरू में धुंधार बत्टिंग करेगा,., फिर युवराज है और इन्फोर्म रैना है हम आसानी से २८९ रन बना लेंगे..   शायद यही अति आत्मविश्वास टीम को ले डूबा...   कल तक जिस टीम की शान मैं हर कोई कसीदे पढ़ रहा था  आज उसी टीम ने हम सबकी उम्मीदों का बंद बजा दिया ..  ठीक है हर बार हम जीत की उम्मीद नहीं कर सकते पर इस तरह से हार की उम्मीद भी नहीं की होगी किसी ने..  .खैर अभी और भी मैच बाकि है...शायद धोनी& कंपनी कुछ उसी तरह का पलट वर कर जाये जैसा की टेस्ट सिरीज  में किया था..  लेकिन तब सचिन और लक्ष्मण  ने बात संभाल ली थी..  खैर हम तो दुआ करेंगे की सब ठीक हो  और हम एशिया कप की तरह यह टूर्नामेंट भी अपने नाम कर लायें...  आमीन 

Saturday, August 7, 2010

( अन ) कॉमन वेल्थ गेम .. राजनीति और बेचारा कॉमन मेन ....

""" आदमी मुसाफिर है आता है जाता है , आते जाते रस्ते में घोटाले छोड़  जाता है.""" ... अरे अरे ये कोई फ़िल्मी गाना नहीं है आज की सच्चाई है...आज   आप चाहे किसी भी शहर मैं हों ..  किसी भी राज्य मैं हों..  आपके घर में आने वाला अख़बार और न्यूज़ चैनेल आपको बस  कॉमन वेल्थ  से जुडी खबर ही दिखायेंगे ..   भाई दिखाए भी क्यों न..   हर किसी बड़े मुद्दे को तो दिखाया ही जायेगा,,,  भाई बात रिश्वत और घोटाले से जुडी जो है..  वो  भी  कॉमन वेल्थ के घपले और घोटाले की .. जिसने बाकि हर खबर को पीछे धकेल दिया है जैसे आमदनी के मामले मैं धोनी ने सचिन को पीछे धकेल दिया है...  खैर अपनी बात पर लोटते हैं ..
हमारा मीडिया भी कोई बात तभी उठता है जब बात खुद ही खुल जाये ! भाई मेरा मतलब यह है की जिस देश मैं कहीं कोई छोटी सी सड़क या नाली तक बनने में कई साल और कई सारे करोड़ रुपये लगाये जाते हैं वहां इस तरह के बड़े आयोजन मैं ये सब तो होना ही था. सबसे पहले तो इन खेलों के आयोजन के पीछे मकसद ही  था की किसी भी तरह से सब अपनी  अपनी ""कॉमन - वेल्थ ""को बढ़ाएं ....  जो बाद में होगा देखा जायेगा,,  होगा भी क्या जाँच होगी ...  पर कोई करवाई नहीं होगी ,  भाई आज तक हुई है क्या किसी पर जो अब होगी....
और वैसे कोई करवाई होनी भी नहीं है ..  क्योंकि करवाई करेगी सरकर जो अब तक सिर्फ सो ही तो रही है..  क्योंकि कुछ भी गलत हो रहा हो सरकार तो अपने ५ साल के लिए मिले बहुमत का पूरा मजा ले कर ही कोई बात सोचेगी..   आपको शायद याद होगा ही  की महंगाई बढ़ रही है...  गोदामों में रखा कई करोड़ टन गेहूं , और अन्य अनाज सड गए ..  किसानो ने आत्मा आहत्य तक कर डाली.. पर महंगाई कम तो नहीं हुई सरकर की कृपा दृष्टि से बढ़ और रही है.   वहीँ कई लोग आज भी १ समय ही खाना खा पा रहे हैं... जब इतना सब होने पर सरकार नहीं जागी तो अब कैसे जग सकती है..   विपक्ष है वो भी कुछ दिन तक आवाज उठाएगा फिर सब शांत ..   अपना मीडिया भी!!!!
तो भाई लोगों सब कुछ भूल कर अपना काम करते रहो..  सरकार को टेक्स देते रहो..  लेकिन भूल से भी यह मत सोच लेना की यह अपनी चुनी हुई सरकार, हमारे लिए कुछ करेगी..???   भाई जब  तकरीबन  2५००० करोड़ रुपये से ज्यादा  इन खेलों में लगा  डाले और  शायद कुछ और लगाने की तयारी है..  क्योंकि बात देश की नाक की है..  
                                                                              लेकिन देश की नाक बचाने  मैं इतना रुपया लगाने वाली सरकार देश के खजाने मैं पैसा जमा करने वालों के लिए शायद कभी कुछ नहीं करेगी..   क्योंकि सरकार सिर्फ राजनीती करती है  ..  सिर्फ राजनीती यानि की ""राज करने के लिए निति बनाना"" ..  आम आदमी जाये भाड़ मैं   उसके पास तो ५ साल बाद जाना है..  अभी तो बहुत दिन हैं...   तब तक कुछ और नए नए काम करने हैं..काम यानि की फिर नए घोटाले ...  नए नए खुलासे और नयी तरह की जांचे होंगी... हाँ सही भी है ऐसे में एक गाना याद आता है जो कलमाडी जी और हर घोटालेबाज , आम आदमी को सुनाना चाहेगा  की,,, .." अपनी तो जैसे तैसे , थोड़ी ऐसे या वैसे कट जायेगी.. पर  आपका क्या होगा रे .... कॉमन आदमी.."""...तो है रे कॉमन आदमी यानि की आम इंसान तू अपना ध्यान इन बातों मैं मत लगा और अपना काम कर. क्योंकि तू इसी के लिए बना है..  समझा..


दीपक सिंह
09425944583

Tuesday, July 27, 2010

येही कांग्रेस का हाथ है भैया.... पता नहीं देश को कहाँ धकेलेगा....

आजादी के बाद से हमारे देश मैं कुछ सालों को छोड़ दिया जाये तो ज्यादातर समय कांग्रेस का ही शाशन रहा है...  हमारे देश ने क्या हासिल किया इन सालों मैं,. कांग्रेस का ज्यादातर समय तो देश पर किस तरह राज किया जाये , इसी बात को सोचने मैं बीता है,,, आज जब हर तरफ महंगाई की बात हो रही  है., आतंकवाद की बात हो रही है , तो कांग्रेस पार्टी और उसके नेता अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाये व्यर्थ के मुद्दे उछाल कर हमारा ध्यान खास मुद्दों से उठा रहे हैं...   

आज जब हर तरफ महंगाई का मुद्दा हावी है तो कांग्रेस पार्टी ने इसी समय को गुजरात के एक मंत्री को सी,बी. आई की गिरफ्त मैं जाने के लिए चुना  . ??  क्या यह एक संयोग है या कोई सोचा समझा प्लान??? ताकि जनता का ध्यान महंगाई के मोर्चे पर सरकार  की असफलता पर न जा सके . 

दूसरी बात आज जब हमारे देश मैं आतंकवादी घटनाएँ ऍम बात होती जा रही तब भी इन घटनाओ को रोकने के उपाए करने के बजे सरकार का ध्यान आतंकवाद को भी हिन्दू और मुसलमानों के हिसाब से बांटने पर है की यह तो मुस्लिम आतंकवाद थे या यह हिन्दू आतंकवादी थे.

कभी हमारा देश सिर्फ हिन्दू / मुस्लिम के नाम पर लड़ता था, आज हम मराठी, बिहारी या हिंदी , मराठी के नाम पर लड़ रहे हैं. भाषा , प्रान्त और तो और पानी तक के लिए लड़ रहे हैं इन बैटन पर तो हमारे प्रधान मंत्रो और सरकार का ध्यान जाता नहीं..  बल्कि वो तो सरकार की कमजोरी छुपाने के नए बहाने बनाने मैं व्यस्त है , नेता अपनी दुनिया मैं मस्त हैं... और ऍम आदमी त्रस्त है......  क्या होगा इस देश का ..   येही कांग्रेस का हाथ है भैया.... ..

Tuesday, June 29, 2010

आग और रावण का kismat connection...

राजनीति ने रावन को धो क्या डाला,  बड़े बच्चन  साहब के मुह से न जाने क्या क्या निकलवा डाला ,
                                                              मणि सर को भी विवाद मैं घसीट डाला , इस आग मैं  वर्मा जी ने भी घी डाला ,                                    कोई कुछ कहे या न कहे हर किसी को इस रावन ने हिला डाला ,                                                                 कल के गुरु भाई को  को सांवरिया ने पछाड़ डाला ,                                                                               बचचन चाहे बड़े हो या छोटे दोनों ने प्रयोगवादी के नाम पर अपना मुह जला डाला ...एक को आग तो वक को रावण ने जला डाला ......

Thursday, June 24, 2010

""" कन्याधाम "" संघर्ष सपनो का विरासत से... एक लड़की और वो भी वारिस ???? हरगिज नहीं हो सकता !

एक लड़की और वारिस ???? कभी नहीं ...  जी हाँ यह एक सत्य है,,   आज जिस ज़माने मैं हम लोग जी रहे हैं वहां लड़किओं को बराबर का दर्जा दिया जा रहा है जैसे के नौकरियो मैं , फिल्मो मैं तो लडकिय राज कर रही है ,, और राजनीती मैं तो पूछिए ही मत वहां तो महिलाओं का वर्चस्व है,,,  मगर इसी समाज और इसी देश मैं रहती है किसना...  किसना जो आज   तक लड़ रही है अपने हक़ के लिए...और वो भी उस राज्य मैं जहाँ की मुखिया एक औरत है..  यह एक कडवी किन्तु सच्ची कहानी है..  किसना ने अपने माता और पिता की विरासर को बचाने  के लिए जाने क्या क्या नहीं किया, और इस समाज मैं मोजूद जालिमों ने उसकी इस विरासत को पाने के लिए न जाने क्या क्या छल कपट न किए...  जैसे की  किसना के परिवार पर हमला , किसना के परिवार वालों को झूठे केस मैं फ़साना , साम , दाम ,  दंड और भेद हर तरह से लालची लोगों ने कोशिश कर के देख ली है , पर  किसना जो सीधे सदी है और ज्यादा पढी लिखी न होने के बावजूद डटकर सामना कर रही है हर संकट का और  आज तक लड़ रही है अपने हक़ के लिए....    मगर यह संघर्ष सिर्फ आज का नहीं है..   यह कहानी शुरू हुई थी तब जब किसना सिर्फ १० साल की थी...  और तब उसके माँ और बाबा अपनी विरासत और वंश की खातिर एक लड़के के लिए तरस रहे थे मगर भगवन को उनकी एक भी प्रार्थना प्रसन्न नहीं कर सकी और इसी चिंता मैं किसना के माँ और बाबा घुलने लगे की कल को उनके बाद इस जमीन और इस विरासत का क्या होगा...  क्योंकि किसना तो कल को शादी कर के पराये घर जायेगी और अगर उसे वारिस बनाये भी तो क्या इस ज़माने का वोह सामना कर सकेगी जहाँ जुल्म और जुल्मिओं का ही राज है भला वहां एक लड़की कैसे खुद  को और अपनी विरासत की सहेज पायेगी.    ??????
क्रमश:

Thursday, April 15, 2010

एक तेजी से बहती गरम हवा आई पी एल

जी हाँ  यह कोई मामूली बात नहीं है , भाई गर्मी में जो गरम हवाएं बहती हैं , वोह सिर्फ कुछ दिन तक ही तो रहती हैं फिर चली जाती हैं , वैसे ही आई पी एल भी किसी तेज चलती गरम हवा से कम नहीं है , आपको याद होगा की किस तरह से यह क्रिकेट का तमाशा शुरू हुआ था , हर किसी क्रिकेट विशेषज्ञ ने इस तमाशे की जी बहर का र निंदा की थीम आज वे ही इस तमाशे का आँखों देखा हाल सुनाते हैं, वो भी अपने अपने दिलचस्प अंदाज मैं,...   खैर मुद्दे की बात करें आज कल आई पी एल  अपने कुछ दुसरे कारणों से कुछ ज्यादा ही चर्चा में है !
वोह हुआ कुछ यूँ है की अपने मोदी जी और थरूर जी में शब्द जंग बढ़ते बढ़ते कहाँ पहुंचेगी इसका तो पता नहीं,,  पर इसने आई पी एल  की छीछा लेदर कर फ़ेंक दी है . भला आप ही सोचे की इस सब से किसका फायदा होगा और किसका नुक्सान ..    कुल मिला कर इन दोनों के लफड़े ने आई पी एल  की कई ऐसी बातें परदे से बाहर निकाल दी हैं जिनसे आई पी एल  का फायदा तो नहीं पर नुक्सान जरूर होगा , जैसे की मोदी जी के नजदीक के रिश्तेदार का कुछ हिस्सा राजस्थान की टीम मैं है , और यह टीम पहला आई पी एल  भी जीती थी , भला सोचिये की एक ऐसी टीम जो आई पी एल  की सबसे सस्ती टीम है. बगेर किसी बड़े नाम के खिलाडिओं के साथ वो टीम आई पी एल  जीत जाती है , सबसे सस्ती टीम की कुल कीमत तब से लेकर अब तक कई गुना बढ़ चुकी है वोह भी सिर्फ उस एक खिताबी जीत से ,     इस सब में कुछ तो अंदरखाने वाली बात है , क्या वो कहीं पहले से चला आ रहा मैच फिक्सिंग वाला भूत तो नहीं और शायद हो भी सकता है, या नहीं भी पर आई पी एल  में कुछ भी संभव है ...  मोदी जी जरा सावधान आपका पंगा एक केंद्रीय मंत्री से पड़ा है..   जरा जरा संभल कर कदम रखें आप कहीं कुछ गड़बड़ हो गयी तो यह क्रिकेट का तमाशा जितनी तेज गति से आगे बढ़ रहा है कहीं उस से तेजी से धडाम कर के कहीं गिर न पड़े...     

Friday, March 19, 2010

उत्तर प्रदेश में माला की माया !!!!!...

वैसे तो आजकल मयावती जी  की काफी ज्यादा ही चर्चा हो चली है, भाई हो भी क्यों नहीं, माया जी जो भी करती हैं वो चर्चा में तो आ ही जाता है, चाहे वो किसी केंद्रीय मंत्री या नेता का उत्तर प्रदेश में प्रवेश वर्जित करना, किसी दौरे पर आने वाले नेता को बीच राह में रोक देना या फिर अभी तजा तजा ५१ करोड़  की माला को धारण करना ,  लेकिन मरा तो येही कहना है की माया जी के राज मैं एक तरफ तो मायावती जी को ५१ करोड़ के हार पहनाये जा रहे हैं वहीँ उनके ही राज में महिलाओं को न सिर्फ प्रताड़ित किया जा रहा है , बल्कि लूटा , मारा और जलाया भी जा रहा हैं, क्या यह संयोग है की एक तरफ तो एक स्त्री को सम्मान के साथ महिमा मंडित किया जा रहा है वहीँ स्त्रिओं को प्रताड़ित करने में कोई कसर बाकि नहीं रखी  जा रही है.....इन फोटो के द्वारा कोई भी जान सकता है की उत्तर प्रदेश में महिलाओं का क्या हाल है  न सिर्फ दलित बल्कि ऊंची जाती की महिलाओं की भी कोई सुरक्षा की ग्यारंटी नहीं है..... 

Wednesday, February 17, 2010

कन्या धाम ..... संघर्ष सपनो का विरासत से.......

यह कहानी है किसना की....  किसना  जैसा नाम वैसा ही  रूप , रंग , और स्वभाव ...   बचपन से उसने देखा था अपने माँ और बाबा को एक लड़के के लिए तरसते हुए . पर उसके माँ बाबा के नसीब में लड़के का सुख नहीं लिखा था. इसलिए किसना हमेशा से अपने माँ बाबा का लड़का बनना चाहती थी. पर एक लड़की कभी लड़का नहीं बन सकती ???   क्या बन सकती है , उसे तो ससुराल में अपनी जिन्दगी बितानी है , पति के सहारे जीवन बिताना  है . मगर किसना क्या करे एक तरफ तो उसके माँ बाबा की विरासत जिस पर पूरे गाँव वाले खासकर उस कल्याण सिंह की नजर लगी हुई है, वो तो येही दुआ मांग रहा है की कब किसना की शादी हो जाये और उसके माँ बाबा को बुढापे में गाँव से निकाल कर उनकी सारी विरासत और जमीन सब कुछ हड़प ले....   क्या करेगी किसना संजोएगी सपनो को या संभालेगी माँ बाप की विरासत  लेकिन एक लड़की होकर वो क्या कर पायेगी वो भी तब जब हर कोई उसके सामने तमाम मुश्किलें लिए खड़े हैं...   क्या करे किसना  चुने पिता की विरासत या साकार करे अपने सपनो को....

Monday, February 8, 2010

क्या यही कांग्रेस का हाथ है भईय्या ...?????

क्या यही  ये  कांग्रेस का हाथ है भईय्या ...   समझे क्या..... 

भाई जरा सा याद तो करो किस तरह से ये नारा लोकसभा चुनाव के पहले हर टीवी चैनल , हर गली और हर रेडियो पर सुनाई देता था , जिस वजह से कांग्रेस को पूरा बहुमत हासिल हुआ को वो फिर से सत्ता में आ गई.  लेकिन ये क्या भाई अभी तो पूरा साल भी नहीं हुआ और इस हाथ ने तो हर एक आम इंसान की कमर ही तोड़ कर रख दी और तो और यह दर्द कम तो हिगा नहीं बल्कि बढ़ने के सरे इन्तेजाम होने वाले हैं , भाई हो भी क्यों न अभी टी पूरे ४ साल बाकी हैं, किसानो का जितना कर्ज माफ़ किया था सारा का सारा ब्याज सहित वसूलना है, महंगाई को तो अभी और ऊंचाई तक पहुंचाना  है, हर गैर कांग्रेसी राज्य में सारा दोष उस राज्य की सरकारों पर मढना है, गौर जरूरी बयान देना बाकि है , किसी समस्या का हल निकलना तो दूर बल्कि उसके लिए किसी न किसी को कसूरवार ठहराना बाकि  है, लेकिन कांग्रेस शाषित राज्यों में जो भी गलत हो सब कुछ जायज कहना बाकि है जैसे के महाराष्ट्र में उत्तर भारतियों की पिटाई या उनके लिए मराठी या गैर मराठी वाली लड़ाई .

कांग्रेस सरकार का तो येही तरीका है भाई जो हम करें वो सही बाकि सब गलत, भाई जिस प्रधान मंत्री के मंत्रिमंडल में ही मंत्रियों में आपसी सामंजस्य नहीं होगा तो उस देश का क्या होगा कोई भी समझ सकता है, जैसे की शशि थिरूर का मुद्दा हो या तीरथ जी के विज्ञापन का मुद्दा या कोई और मुद्दा , यही नहीं जब तक महाराष्ट्र में शिवसेना ने सोनिया और राहुल के लिए बयान नहीं दी तब तक तो कांग्रेस को पता ही नहीं था की मुंबई में कुछ गलत हो भी रहा है,

सच है भाई ये कांग्रेस का ही हाथ हो सकता है जिसका एक हाथ क्या करता है दुसरे को ही पता नहीं चलता तो भला देश हित में क्या हुआ , या देश के अहित में क्या हुआ भला वो कैसे पता चलेगा ,,,,     तो फिर भैय्ये हो तैयार ऐसे ही और ४ साल तक सिसकने के लिए और हाँ शक्कर मत इस्तेमाल करो..............
..
क्रमश:.........

Friday, February 5, 2010

इन्तेहाँ हो गयी .... अब तो बस करो !!!!!!!!111

इन्तेहाँ हो गयी ....  अब तो बस करो . जी हाँ यह तो इन्तेहाँ की भी इन्तेहाँ हो चुकी है, जिस तरह से अमर वाणी और नेता जी का  कथित शब्द युद्ध अपने चरम पर है , जिस तरह से राज , बाल और उद्धव ठाकरे मराठी राग अपने चरम पर है , पर राज्य और केंद्र में आसीन कांग्रेस पार्टी मौन है  इस तरह के हालातों में कोई भला क्या सोच सकता है एक तरफ मराठी राग अलापा जा रहा है और मुंबई से उत्तर भारतीओं को निशाना बनाया जा रहा है, वहीँ उत्तर प्रदेश में खुद एक तरह से अराजकता का माहोल है. इन सब बातों के बीच भला उस आम इंसान का क्या जो इन तमाम नेताओं और राजनितिक दलों के निशाने पर है ....  जरा उसका भी तो कुछ सोचो ...     कांग्रेस पार्टी अब तो नींद से जगे ऐसा मेरा मानना है ...............  बाकी रब जाने

Sunday, January 24, 2010

यह कैसा गणतंत्र ?????

 यह कैसा गणतंत्र ?????    जी हाँ एक आम आदमी के दिल और दिमाग में इस सवाल का आना लाजमी है, जहाँ आज हर कोई २६ जनवरी को गणतंत्र दिवस के लिए तमाम तरह से बातें और तैयारी कर रहा है ख़ास तोर पर सरकारी विभागों में ,  लेकिन क्या कोई यह सोच रहा है की २६ जनवरी एक आम इंसान के लिए कितनी महत्वपूरण है .   शक्कर , अनाज ओर तमाम बुनियादी चीजें कीमत के मामले में आम इंसान की पहुँच से दूर हो रही हैं, अपराध और भ्रष्टाचार रोकने के तमाम दावों के बावजूद बढ़ रहा है,   धर्म के नाम पर , जाती के नाम पर लोग लड़ रहे हैं , राजनेता ऍम इंसान को एक खिलोने से ज्यादा  कुछ  नहीं  मान   रहे हैं, ! इन हालातों में गणतंत्र दिवस की क्या कोई महत्ता रह गयी है ? यह सवाल जितना लाजमी है उतना ही कठिन इस सवाल का जवाब है,
गणतंत्र दिवस मनाया जाता है गन यानि के आम इंसान के अधिकारों और उसके हक़ की महत्ता दर्शाने के लिए लेकिन इसमें उसी आम इंसान के लिए अब कुछ खास नहीं बचा .
यह सवाल शायाद बिना उत्तर के ही रह जायेगा तब तक अगला गणतंत्र दिवस और न जाने कितने गणतंत्र दिवस आते जाते रहेंगे और ऍम इंसान ऐसा ही रहेगा जैसा वो आज से कई साल पहले था बेसहारा, गरीब और शोषित कहता हुआ """"  यह कैसा गणतंत्र """""

Sunday, January 3, 2010

रुचिका episode......

आजकल रुचिका प्रकरण की कुछ ज्यादा ही गूँज सुनायी पद रही है. मीडिया का भी कुछ ज्यादा साथ इस मामले में देखने को मिल रहा है, जो की सही भी है पर इस बात पर तो कोई नासमझ भी हैरानी जाता सकता है की श्रीमान राठोड को जो कृपा प्राप्त हुई है जिस वजह से उन्होंने कानून को अपने घर के किसी नौकर से ज्यादा नहीं समझा.  ...   अदालत , सरकार या सरे के सारे अधिकारी सब के सब राठोड के सामने किसी नौकर से ज्यादा नहीं थे जिस वजह से उसने वोही किया जो वो करना चाहता था, लेकिन अब जिस तरह से सरकार नींद से उठी है तो कुछ उम्मीद रुचिका के परिवार को जरूर हुई होगी, पर  ये तो एक शुरुआत ही है क्योंकि हमारे देश में ऐसे न जाने कितने राठोड आज भी न जाने कितने लोगों का जीवन नरक बना रहे हैं....और अदालत और सरकारें अपने अपने कान और आँखें बंद किए बैठे हैं की जब कोई नया मामला मीडिया के द्वारा आएगा तभी हम अपनी नींद तोड़ कर उठेंगे, शायद यही हमारे देश का भाग्य है और शायद आगे भी ऐसा ही रहेगा.

सूरजमुखी... कहानी अभी बाक है.....

जी  हाँ यह कहानी है सूरजमुखी की..   सूरजमुखी के साथ ३५ साल पहले जो कुछ हुआ था, वो आज कोई नहीं  जानता  है.  हर कोई उसे एक बीती हुई बात समझ कर भूल चुके हैं पर ३५ साल बाद फिर से कुछ ऐसा होने वाला है जो तमाम लोगों को ३५ साल पीछे लेकर जाने वाला है... सूरजमुखी जो एक लाचार और  बेबस औरत थी  किसी को क्या पता था की जो कुछ उसके साथ हुआ था वो उसके मन मैं एक ज्वाला  मुखी को जनम दे रहा है, 
लेकिन क्या हुआ था  उसके साथ वो अब ३५ साल बाद जो कोई नहीं जानता या फिर जान भूझ कर अनजान बन रहा है!!! ....       ३५ साल के इन्तेजार के बाद सूरजमुखी फिर से शुरू कर रही है अपनी अधूरी कहानी ...     उत्तर प्रदेश के आगरा में घटित हुई एक सच्ची कहानी ....  जो हिला देगी तमाम सुन्ने और देखने वालों को...........