Wednesday, April 29, 2009

Kal ho Na Ho...


आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो

आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो

आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो

बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो

आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो

आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो

क्या पता
कल हो ना हो ....



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Regards...
Deepak singh
09425944583

Saturday, April 25, 2009

में देख रहा हूँ , भाजपा को सत्ता में वापस आते हुए .

हो सकता है की मेर ऐ इस ब्लॉग को पढ़ कर कुछ लोग मेरी हँसी उडाएं या चोंक जायें । पर इसमे कोई शक मुझे तो नही है की इस बार भाजपा की सत्ता में वापसी तै है। कोई nahi jaanataa की कल क्या होने वाला है ? वैसे तो कई सारे मुद्दे हैं जिनको भाजपा भुना सकती है पर कुछ बातें मुझे कम लग रही हैं भाजपा की तरफ़ से, निम्न लिखित बातों का भी समावेश अपने प्रचार में करके भाजपा अपनी जीत को पक्का बना सकती है जिनकी काट किसी भी दल के पास नही होगी।

१) डेल्ही में हुई बत्तला हाउस मुठभेड़ के ऊपर कांग्रेस के हे सहयोगी दलों ने सवाल उठाये थे, जिसका जवाब जनता जानना छाहती है की कांग्रेस ने उन नेताओं के ऊपर क्या करवाई की जबकि यह सब कुछ कांग्रेस के ही गृह मंत्रालय द्वारा किया गया था।

२) मुंबई हमले के बाद शहीद हुए पुलिस कर्मिओं के ऊपर कांग्रेस के ही मंत्री के द्वारा ऊँगली उठाई गई , जिसका कोई संतोष प्रद जवाब कांग्रेस नही दे सकी और वेह मंत्री अब भी चुनाव मैदान में हैं।

३) आडवानी के कंधार कांड में किए गए निर्णयों को कांग्रेस पार्टी काफी ज्यादा उछाल रही है, जबकि चिदंबरम जी ख़ुद कह चुके हैं की इस तरह के हालात में कोई भी निर्णय करना मुश्किल होता है जब की १३० लोगों की जान मुश्किल में हो तो तमाम तरह से मुश्किल होती है जबकि ,साल पहले जब जम्मू कश्मीर के एक कांग्रेस समर्थक नेता की पुत्री के लिए आतंकवादी से सौदेबाजी हुई थी, उसे तो कोई याद नही करता जबकि एक लड़की के लिए आतंकवादी छोड गए थे , कंधार में तो १३० निर्दोष लोगों की जान का सवाल था।

४) बाबरी मस्जिद कांड के ऊपर लालू यादव जो की कांग्रेस समर्थित सरकार का हिस्सा हैं , उनका कथन कांग्रेस पार्टी के इस कांड में शामिल होने का सबूत है तो इस काण्ड की जिम्मेदारी भाजपा पर ही क्यों डाली गयी ?

५) भारत देश सदा से एक हिंदू देश रहा है, फिर भी हमारे यहाँ सरे धर्मो का आदर होता है, भाजपा भे किसी धर्म के ख़िलाफ़ नही है, पर कांग्रेस और उसकी सहयोगी दल जैसे की, सपा, राजद, लोजपा आदि पार्टी सिर्फ़ मुसलमानों के लिए ही क्यों आवाज उठाते हैं क्या उन्हें सिक्ख, इसाई, जैन, बोद्ध आदि धर्म संप्रदाय के लोग दिखाई नही देते हैं।

६) कांग्रेस पार्टी के एक मंत्री हैं श्रीमान कपिल सिब्बल जी जो की नरेन्द्र मोदी को मानसिक रोगी कहते हैं, क्या एक मंत्री को एक विकसित राज्य के मुख्या मंत्री के ऊपर ऐसा कटाक्ष शोभा देता है, शायद वेह इस बात से बौखला गए हैं की उनकी सरकार होते हुए भी टाटा नानो गुजरात में क्यों चली ।


७) कांग्रेस पार्टी के गृह मंत्री थे श्रीमान पाटिल , जिन्होंने डेल्ही, जयपुर, बंगलोर में हुए धमाकों के बाद सिर्फ़ मीडिया में निंदा के बयां दी थे। उनके गैर जिम्मेदाराना बयानों के लिए उनको अपना त्याग पत्र देना पड़ा, वहीँ कांग्रेस के ही एक मुख्यमंत्री को मुंबई हमलों के बाद इस्तीफा देना पड़ा अपने गैर जिम्मेदाराना यवहार के लिए।

८) कांग्रेस की ही देन है तीसरा मोर्चा, और चोथा मोर्चा सत्ता के लालची दलों और नेताओं को बढावा दिया है कांग्रेस पार्टी ने , जिसकी वजह से सपा, राजद और वाम दल आज अपनी मर्जी चलाना चाहते हैं वोह भी प्रधानमंत्री bannane के लिए और सत्ता पाने के लिए.वैसे भी laloo to ख़ुद ही manmohan जी के ऊपर सवाल uthaa चुके हैं.

यह तो सिर्फ़ कुछ बातें हैं जो भाजपा शायद भूल रही है, हो सकता की इन बातों से भी बड़ी बातें पार्टी के एजेंडे में है, पर क्या karoon में तो एक लेखक, गायक , रेडियो जोक्केय और एक मनोरंजक हूँ यानि की कलाकार हूँ , पर कुछ दिनों से बेकार हूँ यानि बेरोजगार हूँ, सोचा की कुछ लिखूं , क्या पता यही हो मेरी नियति, की मुझे भी भा जाए राजनीति, वैसे भी तो में हूँ लाचार, सोचा की क्यों करून भाजपा का प्रचार।

दीपक सिंह
09425944583

Monday, April 20, 2009

कानून देता है अपराधी को बढावा और आम आदमी को छालावा !!

"इस ब्लॉग को कोई व्यक्ति या संस्था व्यक्तिगत रूप से न ले । यह मेरे निजी विचार हैं।"

पिछले कई दिनों से हमे यह बातें सुनने को मिल रही हैं की चुनाव में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को tickit देना उचित है या नही, पर कोई यह नही कहता की क्या कानून इसकी इजाजत देता है या नही।
नेता चाहे किसी भी पार्टी का हो , कोई भी दल हो कहीं न कहीं हर पार्टी में कोई न कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाएगा जिस पर कहीं न कहीं आपराधिक केस दर्ज है, ऐसे में कानून पर काफी सवाल उठ जाते हैं अपने आप। जरा सोचिये एक आम आदमी यदि किसी सरकारी या निजी फर्म में नौकरी के लिए आवेदन करता है तो सबसे पहले यही जांचा जाता है की कहीं उस आदमी का कोई केस या आपराधिक पकरण तो नही था या उसकी कोई आपराधिक पृष्ठभूमि तो नही है। लेकिन जो लोग संसद में या विधानसभा में चुने जाते हैं क्या उनके लिए ऐसी कोई व्यवस्था होती है ? नही !
एक आम आदमी यदि किसी केस को अदालत में लड़ता है तो उसके जूते अदालत के चक्कर लग लगा कर घिस जाते हैं, वहीँ पैसा और पहुँच के बल पर कोई भी व्यक्ति पकड़े जाने के पहले ही जमानत लेकर आराम से अपने मर्जी से क़ानून की कमिओं का फायदा उठा लेते हैं। हमारे देश के निति निंताओं को इस बारे में जरूर सोचना होगा , तभी आम आदमी और ऊंची पहुँच वाले व्यक्तिओं के बीच होने वाला कानूनी भेदभाव मिट पायेगा।

कृपया अपने विचार जरूर भेजें।

दीपक सिंह
09425944583

Saturday, April 18, 2009

Kasak....



  ना हमने बेरुखी देखी न हमने दुश्मनी देखी,
तेरे हर एक सितम मे हमने कितनी सादगी देखी,

कभी हर चीज़ मे दुनिया मुकम्मल देखते थे हम,
कभी दुनिया कि हर एक चीज़ मे तेरी कमी देखी,

न दिन मे रोशनी देखी , न शब मे चान्दनी देखी,
टेरी उल्फ़त मे हुम्ने इस कदर भी ज़िन्दगी देखी,

वो क्या एह्द-ए-वफ़ा देगे? वो क्या गम की दवा देगे?
ज़िन्होने देख कर भी इश्क़ मे जन्नत नही देखी??

यहा हुम दिल जलाकर के किया करते है शब रोशन,
वहा एक तुम हो जिसने देखी भी तो आग़ ही देखी,

'कसक' हर बार सोचा है गिला करना न भूलेगे,
मगर हर बार भुले है वो आखे जब भी नम देखी..

 
 

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Regards...
Deepak singh
09425944583

Sunday, April 12, 2009

u.p में लोकतंत्र नही ... नही शोषण तंत्र .... कोई मददगार नही !

2/04/2009
tasweer उत्तर प्रदेश पुलिस की..... एक पत्र मेरे नाम , कोई तो मदद करो ।

मेरा नाम रामसिंह भदोरिया, पुत्र श्री जनक सिंह भदोरिया , निवासी ग्राम चान्गोली तहसील बह जिला आगरा का हूँ। विगत कुछ दिनों से मुझे और मेरे परिवार को पुलिस और कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा लगातार प्रताडित किया जा रहा है। विगत दिनों दिनांक १२/०३/२००९ को होली के दूसरे दिन मेरे घर पर कुछ पुलिस वाले आए और मेरे ध्योते उपेन्द्र ( banty) को बुलाने लगे, जब मेने पुछा ki क्या बात है तो कुछ नही बोला , बस यही कहा की उससे कुछ पूछना है। मेरा ध्योता जयपुर में काम करता है साथ हे फौज में नौकरी के लिए प्रयास भी कर रहा है। जब उपेन्द्र को बुलाया तो पोल्स वाले उसको लेकर जाने लगे , मेने पुछा की आप तो पूछने आए थे अब लेकर क्यों जा रहे हो, तो वेह लोग बोले की इस gaon में क्षेत्रीय विधयक द्वारा लगवाया गया शिलालेख तोडा गया है, जिसमे मेरे ध्योते उपेन्द्र का नाम है, यह बोल कर उसको थाने में बैठा लिया , जब हम लोग उसको छुडाने पहुंचे to police अधिकारी बोले की विधयक का शिलालेख दोबारा लगवा दो तो हम आपके ध्योते को छोड़ देंगे , तब तक नही छोडेंगे।

महोदय , बात यही नही थी, जब हमने पुछा की पुलिस को और vidhaayak को यह बात किसने बताई, कोई प्राथमिकी हो तो बताई जाए पर उन्होंने कुछ नही कहा बस यही कहा की आप लोग वह शिलालेख लगवा दो। ७२ घंटे के बाद १५/०३/२००९ को आखिरकार मेरे ध्योते के ऊपर दफा १५१ लगा दी गयी तब हम उसकी जमानत करा सके। मेरा यह कहना है की कुछ असामाजिक tatva यदि यही करते करते रहेंगे और पुलिस उन्हें पकड़ने के बजाये उन्हें सरंक्षण प्रदान करती रहेगी तब तक मेरे जैसे किसान का इस समाज में रहना मुश्किल नही बल्कि असंभव हो जाएगा, जो मजदूरी करके apanaa परिवार paalte हैं।
मेरा आपसे निवेदन है की यथा सम्भव करवाई और निष्पक्ष जांच करके असली गुनेहगार को सामने लाया जाए और मेरे ध्योते के ऊपर जो दफा १५१ लगा दी गई है उसको हटाया ताकि उसके भविष्य पर कोई prashna chinha न लगे।

महोदय उचित करवाई करेंगे ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है।


Thursday, April 9, 2009

अक्षय कुमार, पत्रकार, नेता और जूता !!!!!

अमेरिकी राष्ट्रपति बुश के ऊपर जो जूता फेंका गया था उसकी दुनिया भर में चर्चा हो गई थी, यहाँ तक की जूता फेंकने वाले पत्रकार को सब कुछ मिला तारीफ भी, सजा भी और तमाम तरह की शोहरत और दोलत भी। ऐसा ही कुछ नजारा भारत में भी देखने को मिला जब चिदंबरम जी के ऊपर जर्नल सिंह नमक पत्रकार ने अपना जूता फ़ेंक कर अपना विरोध जाता दिया जगदीश तैत्लोर को लेकर, वहीँ अक्षय कुमार ने भी नया विवाद पैदा कर डाला । इस घटना ने भारत में एक सनसनी फेला डाली है, अब सरे नेता अपने अपने प्रेस कांफ्रेंस में सुरक्षा पर ज्यादा धयन देंगे , खासतोर पर पत्रकारों से और उनके जूतों से हो सकता है की अब प्रेस कांफ्रेंस में सरे पत्रकारों को जूते उतार कर आना पड़ जाए।

लोकतंत्र में हर इंसान को अपना विरोध जताने का हक है और अभिव्यक्ति का bhi। तरीका चाहे जैसा हो सब चलता है और वोह भी भारत जैसे देश में तो सब कुछ जायज है, गनीमत है की जर्नल सिंघजी सजा से बच गए और अक्षय कुमार माफ़ी मांग कर बच गए , वरना उनका पैंट और जर्नल का जूता उन्हें जेल भेजने के लिए काफी था, पर क्या यहाँ के अभिनेता और
राजनितिक नेता और दलों को यह घटना आत्मचिंतन का एक मौका नही देती ?

क्यों हमारे नेता ऐसा काम करते हैं जिसके लिए उन्हें विरोध सहना पड़े और फिर सरे आम माफ़ी मांगना पड़े, खैर हमारे यहाँ तो ऐसा होना आम बात है नेता हो या अभिनेता सब यही करते हैं, पहले तो जो मन में आए कर देते हैं, बोल देते हैं फिर माफ़ी मांग लेते हैं। यही हमारे देश का नया ट्रेंड हो गया है । वोह चाहे अक्षय कुमार हो, जगदीश तित्लेर हो देश वासिओं से माफ़ी मांगने में उन्हें कोई शर्म तब तक नही आती जब तक उनका विरोध न किया जाए, जब किया जाता है तो मजबूरी में यही रास्ता बचता है। वैसे जगदीश तित्लेर्जी के ऊपर कोई आरोप साबित नही हुआ है पर फिर भी जनभावना का समान तो करना ही चैये था कांग्रेस को और अक्षय कुमार को जो सरेआम अपने जेंस का बटन खुलवा बेठे थे और फिर माफ़ी मांग बेठे ।

दीपक सिंह
09425944583

Tuesday, April 7, 2009

लालू का बडबोलापन और वरुण.

लालू यादव ने वरुण गाँधी को लेकर जितनी सुर्खिआं बटोरी हैं उतनी शायद उन्होंने रेल मंत्री होते हुए भी नही बटोरी होगी। वेह अगर गृहमंत्री होते तो वरुण पर रोलर फिरवा देते फिर चाहे जो होता , देखा जाता। उनके जैसे वरिष्ट नेता के मुह से इतनी तुछी बातें सुनकर बड़ा अजीब सा लगा पर यही राजनीतित है। कब क्या करवा दे कोई पता नही पड़ता।
उन्होंने मुलायम और पासवान के संग अपना नया मोर्चा बन लिया , नै उमंग और नए उत्साह में वेह वह सब कह गए जो शायद उन्होंने सोच नही था, शायद चुनाव आयोग को यह सब दिखाई या सुनायी नही दे रहा है, जब वरुण का भाषण साम्प्रदायिकता से भरा हुआ था तो लालू का भाषण कोई रस से भर तो नही है, इसमे भी उन्होंने अल्पसंख्यक वर्ग को साधते हुए वरुण पर निशाना लगा दिया , साथ ही उनकी पत्नी रबरी देवी ने भी वह सब कह डाला जो उन्हें परेशां करने के लिए काफी था। अन चुनाव आयोग को पुरी तरह से जांच करके कदम उठाना होगा नही तो उस पर भेदभाव के आरोप लगना तय है। देखन होगा लालू के लिए चुनाव आयोग और राज्य सरकार क्या कदम उठाती है।


दीपक
09425944583

कुछ सोच लिया जाए !!!! पर क्या ???

घर पर युही बेकार और बेरोजगार बेठे बेठे मेने सोचा की चलो कुछ सोच लिया जाए! अपने खली दिमाग को थोड़ा सा काम दिया जाए, कुछ सोच लिया जाए.
सोचा की क्यों न जनहित और देश कल्याण के लिए सोचा जाए , बड़े बड़े विद्वान और महापुरुषों की जमात में शामिल हुआ जाए, कुछ सोच लिया जाए। तो सोचा यह की देश के विकास में जो रोड़ा हैं जैसे गन्दी राजनीती, स्वार्थ, लालच, आतंकवाद, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार इनको दूर कैसे किया जाए, थोड़ासोचा था की सोच पर भी राजनीती हावी हो जाए ! ऐसे में भला कैसे सोचा जाए। क्योंकि यदि इनको दूर कर दिया तो देश की ब्रांड इमेज का क्या होगा यही सोच कर इस सोच को त्याग दिया जाए , कुछ और सोच लिया जाए।

अब सोचा क्यों न थोड़ा सा मनोरंजक आईडिया सोच जाए क्यों न टी.वि पर कुछ नया लाया जाए, रियलिटी शो, म्यूजिक शो के बाद कुछ और लाया जाए, क्यों न झलक के मंच पर अपने बालिए के संग डांस पर चांस मार लिया जाए, पर यह सोचा था ही की इसमे में सास बहु का झगडा रोड़ा अटकाए , ऐसे में क्या और कुछ सोचा जाए।
सोचा की क्यों न कुछ और किया जाए, आराम छोड़ कर कुछ काम किया जाए , पर मुझ बेरोजगार को कुछ काम तो न मिला यही सोच कर काम पाने के नुस्खे वाली पुस्तक ही पढ़ ली जाए, पुस्तक ने भी मेरा दिमाग चकराया , यहीं पर मेरा मन भी घबराया , वैसे भी सोच कर किसका क्या हुआ है,जिसने सोचा वही पछताया है, मेरी सोच भला मुझे क्या देगी, इसने किसिस को क्या दिया है जो मुझे भे देगी, यही सोच कर मेने सोचा की सोच को आराम दिया जाए और कर लिया जाए कोई जॉब क्योंकि अब तो गली का कुत्ता भी दिखता है मुझे" रॉब".

Saturday, April 4, 2009

लालकृष्ण आडवानी और मनमोहन singh की बहस कितनी सही और ग़लत.


कुछ दिन पहले आडवानी जी ने कम बोलने वाले और मृदुभाषी मनमोहन सिंह को अब तक का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री बताया, और उन्हें सीधी खुली बहस के लिए न्योता दियामनमोहन सिंह से आडवानी जे बहस करके क्या साबित करना चाहते हैं, शायद वेह बहस के द्वारा मनमोहन को चुप करके अपनी दावेदारी को मजबूत बनाना चाहते हैं , हो सकता है वेह सही हों क्योंको हर कोई जनता है की मनमोहन सिंह इतने अच्छे वक्ता नही हैं, पर वेह इतने कमजोर भी नही हैं की कोई जवाब नही दे सकते


बहस का तरीका पश्चिमी देशो में ज्यादा प्रचलित है, जरूरी नही की हम हर चीज में पक्शिम की नक़ल करें और आडवानी जी को बहस करनी है तो तमाम प्रधानमंत्री पड़ के दावेदारों से करनी होगी, क्योंकि हर दल का अपना एक एक दावेदार मोजूद हैक्या वेह इसके लिए तैयार हैं???


मनमोहन जी ने सही किया जो बहस का न्योता स्वीकार नही किया ,क्योंकि सत्ता में आने के बाद पिछले साल से वेह सब आपस में बहस हे तो करते थे उस बहस को भे सरे लोगों ने देखा था इस लिए इस नै बहस का कोई मतलब ही नही बनताजाहिर है की जब जनता टीवी के मध्यम से लोकसभा में होने वाली बहस को ही नही झेल पति तो इस नई चुनावी बहस को कोण झेलना चाहेगाआपको क्या लगता है!!!!

Thursday, April 2, 2009

सबके ननों में समां गई टाटा की nano

एक समय था जब आदमी की सबसे पहले जरूरत के रूप में नाम लिया जाता था रोटी, कपड़ा और मकान। लेकिन समय के साथ जरूरत में भी बदलाव आ गया है , कुछ साल पहले इन जरूरतओ के साथ मोबाइल भी शामिल हो गया था जब धीरुभाई अम्बानी की आम आदमी तक मोबाइल पहुचने की योजना रेलिएंस इंडिया मोबाइल के साथ आई थी।
लेकिन तब भी कुछ कमी थी जो अब रतन टाटा ने पुरी की है साथ हजी अपना वडा भी , वडा आम आदमी की पहुँच में ४ पहिया गाड़ी लेन का। रतन टाटा भारत के सबसे आमिर व्यक्तिओं की लिस्ट में शामिल नही किए जाते, न ही वे सबसे प्रभावशाली लोगों में गिने जाते हैं कुछ तथाकथित पत्रिकाओं के द्वारा बने जाने वाली लिस्ट में। फिर भी जहाँ भरोसे और इमानदारी बात आती है तो टाटा का अपना अलग स्थान है।
अब रोटी , कपda, मकान और मोबाइल के साथ कार भी प्रथम जरूरत में शामिल हो जायेगी। (रो,का,म, मो,का) यही अब नया नाम बन जाएगा प्रथम वरीय आवश्यकताओं का , टाटा नानो ने न सिर्फ़ भारत का नाम ऊँचा किया , वरन देश के हर उस आदमी को एक उम्मीद दी है जो कल तक कार को एक सपने के रूप में देखते थे। टाटा का भी अन्य दूसरे udhyogpatioyn की तरह profit kamana lakshya है पर इसके अलावा भी टाटा नानो ने unhe woh स्थान दिला dia है जिसके lie unhe wakai salaam किया जन chaiye।
tamama pareshanio , arthik mandi और तरह तरह के virodh के बाद भी उन्होंने अपना वडा निभा ही dia ..... टाटा सही arthon में भारत के रतन हैं.